दौलताबाद/देवगिरी किला औरंगाबाद इतिहास और पर्यटन

दौलताबाद/देवगिरी किला औरंगाबाद इतिहास और पर्यटन 

दौलताबाद किला महाराष्ट्र राज्य के औरंगाबाद शहर से 17 किलोमीटर की दूरी पर है औरंगाबाद से वेरुल जाने के रास्ते के बीच में ही यह किला देखने को मिलता है यह किला दौलताबाद नाम के गांव में है। इस गाव का नाम १४ वी शताब्दी में देवगिरी हुआ करता था। देवगिरी यादवों की राजधानी का नगर हुआ करता था। इस किले का निर्माण १२ वी सदी में राजा भिल्ल यादव ने सन ११८७ में किया था। इस किले पर यादव, खिलजी, तुगलक और मुगल शासक जैसे शाशको ने राज किया था।

दौलताबाद/देवगिरी किला औरंगाबाद इतिहास और पर्यटन
दौलताबाद किला औरंगाबाद

दौलताबाद किले तक कैसे पहुंचे?

सड़क मार्ग

सड़क मार्ग से देवगिरी किला जिसे दौलताबाद के नाम से भी जाना जाता है पहुंचने के लिए औरंगाबाद से बस या टैक्सी की सुविधा ले सकते है। अगर आपके पास अपनी खुद की गाड़ी है तो बहुत बढ़िया।

रेल मार्ग

रेल मार्ग पास के सबसे बड़े शहर औरंगाबाद तक जाता है। रेल से आप औरंगाबाद शहर तक जा सकते है। लेकिन उसके आगे किले तक जाने के लिए आपको बस या कैब के जरिए ही सफर करना पड़ेगा।

फीस

देवगिरी किले पर भारतियो के लिए २५₹ और विदेशी यात्रियों के लिए ३००₹ प्रवेश शुल्क है। इसलिए किले में सुबह ९ बजे स शाम ६ बजे तक प्रवेश दिया जाता है।

देवगिरी किले पर देखने लायक जगह

महाकोट दरवाजा

देवगिरी किले में प्रवेश करने के लिए सबसे पहले हमें महाकोट दरवाजे से अंदर जाना पड़ता है। यह किले का मुख्य दरवाजा है।
मुख्य दरवाजे से अंदर जाते ही आपको तोफे देखने को मिलेगी यह तोफे उस जमाने में उपयोग में लाई गई थी। हालांकि अब यह तोफ जहां रखी गई है वह शायद सैनिकों के रहने की जगह थी। यह तोफे इस जगह पर प्रदर्शन के लिए रखी गई है।

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Devgiri/ daulatabad fort gate

दूसरा दरवाजा

देवगिरी किले के दूसरे दरवाजे के ऊपर हाथी का बेहद सुंदर शिल्प की नक्काशी की गई है। इन दरवाजों की आयु लगभग 900 सालों से ज्यादा हो सकती है। लेकिन आश्चर्य की बात है कि इन दरवाजों में जो लकड़ी इस्तेमाल की गई है वह अभी भी बहुत अच्छे हालत में है। यहां से आगे एक और दरवाजा है। और उसके बाद एक मीनार दिखाई पड़ती है। इस मीनार तक जाने से पहले बाई ओर हिंदू मंदिर और दाई ओर कुछ मुस्लिम मजारे दिखाई पड़ती है।

चांद मिनार

चांद मीनार भारत में कुतुब मीनार के बाद सबसे ऊंची मीनार है। सन 1445 में जब अलाउद्दीन बहामनी के पास यह किला आया तब उसकी याद में दिल्ली के कुतुब मीनार जैसा दिखने वाला यह चांद मीनार यहा पर बनाया गया। यह मिनार इस किले की सबसे बड़ी खासियत है।  ३ मंजिला इमारत है। जिसमें २३० सीढ़ियां है।

भारत माता मंदिर

चांद मिनार के बाई और भारत माता मंदिर है। असल में यह एक बहुत ज्यादा पुरातन मंदिर है। मंदिर के सामने एक बड़ी खुली जगह है जो की खंबो से घिरा हुआ है। देखने से ऐसा लगता है कि यह जगह छत से ढकी हुई थी। याहापर शायद कला प्रदर्शन, सभाओं का आयोजन किया जाता होगा। मंदिर के रचना से पता चलता है कि यह मंदिर यादव कालीन होगा। शायद इस मंदिर की मूर्ति को याहसे हटा दिया होगा इसलिए यहापर कोई मूर्ति ना होने के वजह से भारत स्वतंत्र होने के बाद यहापर भारत माता के मूर्ति कि स्थापना कि गई होगी।

पानी का कुंड

भारत माता मंदिर के बाहर एक बड़ासा पानी का कुंड है। जो की अभी सूखा पडा है। बारिश के मौसम में शायद आपको यह कुंड पानी से भरा हुआ मिलेगा।

किले की तटबंदी

देवगिरी किला तीन स्तर वाली दीवारों से घिरा हुआ है। इसे स्थानिक भाषा में कोट कहते है। इनके नाम है अंबेल कोट, महा कोट, और काला कोट। काला कोट तटबंदी के बाहर एक और मंदिर है। यह मंदिर काफी अच्छी नकाशी यो से तराशा गया है। देखने में बहुत ही सुन्दर यह मंदिर है। लेकिन इस मंदिर में कोई भी मूर्ति नहीं पाई जाती है। इस किले पर बनी कलाओ से पता चलता है कि देवगिरी साहित्य और कला के क्षेत्र में बहुत ज्यादा विकसित था। इसी किले पर एक संगीत राग का निर्माण किया गया जिसे देवगिरी बिलावल नाम से जाना जाता है। इस किले कि तटबंदी लगभग ८ किलोमीटर लंबी है।

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Devgiri/ daulatabad fort tarrain

चीनी महल

चीनी महल देवगिरी के महल का अंदरूनी हिस्सा है। इसकी छत पूरी तरह से नष्ट हो चुकी है। यहासे अंदर जाने पर भी एक वास्तु दिखाई पड़ती है जिसकी छत भी नष्ट हो चुकी है।

मेंढा टोफ

देवगिरी किले के एक बुर्ज पर तोफ़ रखी गई है। जिसका नाम है मेंढा तोप है। पंच धातु से बनी इस तोप का एक भाग मेंढ (बकरी) के मुंह के आकार का बना हुआ है। इस तोप पर लिखा हुआ है किला शिखन तोप इसका अर्थ होता है किला उध्वस्थ करने वाली तोप। इसी बुर्ज से किले का बेहद सुन्दर नजारा दिखाई देता है।

काला पहाड़ तोप

काला पहाड़ तोप बारादरी महल से आगे जाने पर एक बुरूज पर देखने मिलती है।

दुर्गा तोप

इस तोप को धुलधान भी कहा जाता है इसका मतलब है सबकुछ मिटा देने वाला। यह तोप देवगिरी किले पर रखी सबसे ऊंचाई पर रखी गई तोप है।

मुख्य किला

देवगिरी का मुख्य किला चारो तरफ से खाई से घिरा हुआ है। इस खाई में मगरमच्छ हुआ करते थे। इस मुख्य किले में जाने के लिए केेवल एक पुल है जो पहले चमड़े का बना हुआ था। इसके बाद आगे घुमावदार और संकरे रास्ते है। जो अंधेरे में हुआ करते है।

भुलभलैया

अंधेरे रास्ते के आगे बुलभूलैया है। देवगिरी किले कि प्रसिद्ध भुलभुलैया यही है। दिन में भी यह भूलभलैया अंधेरे से घिरा हुआ करती है। शत्रु सेना को भुलभुलैया में फंसाकर मारने के अनेक उपाय थे। जिससे शत्रु यहां से आगे बढ़ ही ना पाए इसकी व्यवस्था भी की गई थी।

श्री गणेश मंदिर

भुलभुलैया से आगे जाने पर एक दरवाजा है। उससे अंदर जाते ही एक महल और एक मंदिर दिखाई पड़ता है। यही है श्री गणेश मंदिर।

बारादरी महल

देवगिरी पर मुगल राज्यकर्ता गर्मियों में वक्त बिताने आते थे। यह अष्टकोणी बारादरी महल उनके रहने के लिए बनाया गया था। इसमें सभागृह, मनोरंजन की सारी सुविधाएं उपलब्ध थी। इस महल कि खिड़कियों से आसपास के इलाके का नजारा बेहद सुंदर और शानदार है।

इतिहास

देवगिरी यादवों की राजधानी का नगर हुआ करता था। इस किले का निर्माण १२ वी सदी में राजा भिल्लम यादव ने सन ११८७ में किया था। इस किले पर यादव, खिलजी, तुगलक और मुगल शासक जैसे शाशको ने राज किया था। सन १३२६ में दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने अपनी राजधानी देवगिरी पर लाई थी। और देवगिरी का नाम बदलकर दौलताबाद रख दिया था। दौलताबाद या यूं कहे की देवगिरी किले पर काफी मुस्लिम शाशको ने शासन किया है। और यह मंदिर उन मुस्लिम शाशको के हिन्दू धर्म के प्रति विचार को दर्शाते है। देवगिरी किला भारत के उन किलों में से एक है जिसे सीधे युद्ध में कभी जीता नहीं लगाया जा सका। इसे जीता जा सका सिर्फ गद्दारी या फिर धोखाधड़ी से। इस किले पर बनी कलाओ से पता चलता है कि देवगिरी साहित्य और कला के क्षेत्र में बहुत ज्यादा विकसित था। इसी किले पर एक संगीत राग का निर्माण किया गया जिसे देवगिरी बिलावल नाम से जाना जाता है।

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