तोरना/प्रचंडगड का इतिहास

तोरना/प्रचंडगड इतिहास लढाई और पर्यटन के बारे में जानकारी

पुणे शहर से ६० km दूर यह पुणे शहर से ६० km दूर यह तोरना किला समुद्रतल से तकरीबन ४६३० फुट ऊंचाई पर बना हुआ है। यानी कि पुणे जिले का सबसे ऊंचाई वाला किला तोरना ही है।  तोरना किले से राजगढ़ और सिंहगड, लोहगड, विसापुर चा किला किले देखे जा सकते है। सिंहगड किले की लड़ाई काफी प्रसिद्ध है जिससे प्रेरित होकर २०१९ में tanaji the unsung warrior  नाम की फिल्म भी बनी है।

तोरना/प्रचंडगड इतिहास लढाई और पर्यटन
Torna Fort Budhala Machi

तोरना किला वो किला है जिससे छत्रपति शिवाजी महाराज ने स्वराज्य की शुरुवात की थी। स्वराज्य की लड़ाई में शिवाजी महाराज द्वारा जीता जाने वाला पहला किला तोरना था। तोरण किले से ही शिवाजी महाराज ने स्वराज्य की लड़ाई की शुरुवात की ही। तोरना किला जितने के बाद इस किले पर जो भी धन शिवाजी महाराज को मिला उस धन से शिवाजी महाराज ने एक नए किले का निर्माण कराया वो किला तोरना किले के सामने वाली पहाड़ी पर बनाया गया उस किले का नाम राजगढ यानी स्वराज्य की सबसे पहली राजधानी। राजगढ़ को ही आगे जाकर शिवाजी महाराज ने स्वराज्य की पहली राजधानी के रूप में मान्यता दी। तोरना किले पर तोरण के काफी पेड पोधे है इसलिए इस किले को तोराना नाम मिला। जब शिवाजी महाराज ने यह किला जीत लिया तब किले के आकार को देखते हुए तोरना का नाम बदलकर प्रचंडगड रख दिया क्योंकि यह किला काफी बड़ा था। 

तोरना किले तक कैसे पहुंचे

सड़क मार्ग

अगर आपके पास अपनी खुदकी गाड़ी या कैब है। तो आप किले कि पार्किंग तक गाड़ी से जा सकते है। 
लेकिन अगर आपके पास गाड़ी नहीं है तो आपको किले के नीचे वेल्हे गांव तक बस से आना होगा और यहां से २ km का रास्ता पैदल तय करना होगा। उसके बाद किले पर चढाई कर सकते है।

रेल्वे मार्ग

रेल्वे से आप पुणे जंक्शन तक आ सकते है। उसके बाद आगे का रास्ता कैब या बस से तय करना होता है। अगर कैब से आए तो अच्छा होगा क्योंकि बस किले कि पार्किंग तक नहीं आती वेल्हे गांव तक आती है और वहासेे आपको पैदल रास्ता तय करना होता है।

हवाई मार्ग

तोरना किले का सबसे नजदीक का हवाई अड्डा पुणे हवाई अड्डा है। जो कि किले से ६० km दूर है। Airport से आगे बस या कैब से आगे का रास्ता तय करना होता है। 

तोरना किले पर ट्रेकिंग 

तोरना किला पुणे में ट्रेकिंग के लिए काफी फेमस है। सितंबर अक्टूबर महीने में ट्रेकिंग के लिए काफी ज्यादा लोग इस किले पर आते है। यह किला चढने के लिए काफी ऊंचा है। ट्रेकिंग करते हुए किले पर जाने के लिए २-३ घंटे का वक्त लगता है। इस किले पर चढाई करना इतना आसान नहीं है। इसलिए अगर आपका स्टैमिना काम है या आप जरा सा बीमार महसूस कर रहे है तो मत जाइए गा। क्योंकि बीच में से ही आपको वापिस आना पड़ता है। यह काफी कष्टदायक हो है। 

ट्रेकिंग के लिए पुरें साजो सामान के साथ जाए। अपने साथ भरपूर पानी ले। चाहे तो पैनकिलर की गोली भी साथ ले जाए। किले के ऊपर पानी की सुविधा नहीं है। इसलिए पानी साथ में के जाना फायदेमंद रहेगा। ग्रिप वाले स्पोर्ट शुज ले जाए क्योंकि कुछ रास्ते काफी फिसलन भरे है। Energy drink भी ले जा सकते है। 

तोरना/प्रचंडगड इतिहास लढाई और पर्यटन
Torna Fort View

तोरना किले के आकर्षण

किले के दरवाजे

    बिनी दरवाजा
      बिनी दरवाजा तोरना किले का सबसे पहला दरवाजा है। यह दरवाजा किले के सबसे नीचे की तरफ है। 
        कोठी दरवाजा
          कोठी दरवाजा की रचना कुछ ऐसी है कि यह दरवाजा दूर से देखा नहीं जा सकता। पास जाने पर ही इस दरवाजे का पता लगता है। इससे यह साबित होता है कि यह दरवाजा किले के सुरक्षा के लिए काफी महत्वपूर्ण था। इस दरवाजे कि रचना देखने लायक है। 
            कोकन दरवाजा 
              कोकन दरवाजा से बुधला माची पर जाने का रास्ता है। कोकन दरवाजा अभी भी काफी अच्छी हालत में है। यहां से आगे जाने पर कुछ खंडहर दिखाई पड़ते है। 
                बघड दरवाजा
                  बघड दरवाजा से राजगढ की तरफ जाने वाला एक रास्ता है। यह किला बहुत बड़ा है।  शिवाजी महाराज के का यह किला काफी समय तक स्वराज की राजधानी बना रहा।
                    महा दरवाजा 
                      बघड दरवाजा से आगे जाने पर महा दरवाजा दिखता है। यह दरवाजा काफी बड़ा भी है।
                        चित्ता दरवाजा
                          इस दरवाजे का नाम क्यों चित्त्ता दरवाजा है पता नहीं। किसी जानवर के नाम जैसा इस दरवाजे का नाम है।
                            वाघजाई दरवाजा
                              वाघजाई दरवाजा बुधला माची का सबसे आखिरी दरवाजा है। 

                              किले के तालाब

                              किले पर बहुत सारे तालाब नजर आएंगे। जिनका इस्तेमाल उस समय में पानी को जमा करने के लिए किया जाता था।

                              कोकड तालाब 
                              किले पर सबसे पहला और बड़ा तालाब यही है। इस तालाब का पानी पीने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। इस तालाब में आज भी पानी है। इस तालाब के पत्थर का इस्तेमाल किले के पुनर्निर्मान में किया गया।

                              किले पर माची

                              झुंजार माची
                              झुंजार माची पर जाने का रास्ता बंद है। लेकिन अगर आप जाना ही चाहते है तो एक दूसरा रास्ता भी है। लेकिन इसके लिए लोहे की सीढ़ी से नीचे उतरकर जाना पड़ता है। और आगे का रास्ता बहुत कठिन और संकरा है। क्योंकि इस रास्ते से जाने पर किले से नीचे गिरने का खतरा भी रहता है। इसलिए ज्यादा साहस दिखाना जान पर बन सकता है। इस रास्ते से जाते वक्त सतर्क रहे। 

                              बुधला माची 
                              बुधला माची काफी दूर तक फैली हुई है। बुधला माची तक पहुंचने के लिए ४ दरवाजे से होकर गुजरना पड़ता है। जिसका पुनर्निर्माण शिवाजी महाराज ने किया था। यह माची पश्चिम की तरफ आदि दूर तक है।

                              मेंगाई देवी मंदिर

                              मैंगाई देवी मंदिर को देखने के बाद ऐसा लगता है की इस मंदिर का निर्माण कुछ सालो पहले ही किया गया है। इस मंदिर में रखी मूर्ति काफी सुंदर है।

                              तोर्नेश्वर महादेव मंदिर

                              यह मंदिर भगवान शंकर को समर्पित है। इस मंदिर के अंदर एक बहुत ही सुन्दर शिवलिंग विराजमान है। इसी मंदिर के नाम पर इस किले का नाम तोरना रखा गया ऐसी मान्यता है।

                              तोरना किले का इतिहास

                              इतिहास में तोरना या प्रचंडगड किले का पहला उल्लेख १४७० में मिलता है। तोरना किले का निर्माण किसने कराया इसका कोई भी सबूत इतिहास में नहीं है। पर किले कि निर्माण शैली को देखते हुए ऐसा लगता है कि भगवान शंकर के अनुयाई शैव पंथ के लोगो द्वारा तोरना किले का निर्माण किया गया होगा। ई स १४७०-१४८४ तक इस किला बहमनी सरदार मलिक अहमद के शासन में था। यह वही मलीक अहमद है जिसने आगे  जाकर १४९० में निजामशाही की स्थापना की। उसके बाद सिर्फ सोलह साल की उम्र में शिवाजी महाराज ने कुछ मावलो के साथ मिलकर स्वराज्य का सबसे पहला किला तोरना पर हमला करके किला जीत लिया। इस वजह से मराठी में एक कहावत बनी "शिवाजी महाराज नी तोरना किला जिंकुन स्वराज्य चे तोरण बांधले" तोरना किला जीतने के बाद इस किले का पुनर्निर्माण करते हुए किले का नाम बदलकर प्रचंडगड कर दिया गया। उसके बाद जबतक औरंगजेब ने संभाजी महाराज की हत्या नहीं की तबतक तोरना किला स्वराज्य में ही रहा।

                              जब औरंगजेब ने संभाजी महराज की हत्या की उसके बाद स्वराज्य और दख्खन जीतने कि ख्वाहिश से औरंगजेब ने स्वराज्य का एक एक किले पर हमला करना शुरू कर दिया। और उसी वक्त औरंगजेब ने तोरना किला जीतकर मुगल साम्राज्य में शामिल कर लिया। औरंगजेब ने किले का नाम बदलकर कुतू उलगैब कर दिया।  लेकिन कुछ सालो बाद मराठा सरदार शंकराजे नारायण सचिव ने फिर से तोरना को स्वराज्य में शामिल कर लिया। उस वक्त हिंदुस्तान में काफी हलचल मची थी। काफी सल्तनतो के बीच जंग छीडी थी। ई स १७०४ में औरंगजेब ने फिर से तोरना किले पर हमला कर के जीत लिया। उसके ४ साल बाद फिर से सरनोबत नागोजी कोकाटे ने तोरना किले को फिर से स्वराज्य में शामिल कर लिया और तब से लेकर आज तक यह किला स्वराज्य में ही है।


                              औरंगजेब मराठो से सिर्फ एक ही किला जीत पाया ये वही तोरना किला है। जिसे प्रचंडगड के नाम से भी जाना जाता है। ये किला इतना बड़ा होते हुए भी जब शिवाजी महाराज और औरंगजेब में समझौता हुआ तब भी यह किला स्वराज्य में ही रहा था।


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