प्रतापगढ किला इतिहास और लढाई | pratapgad kila itihas or ladhai

प्रतापगढ किला इतिहास और लढाई

सातारा से २०km दूर यह प्रतापगढ़ दुर्ग (या किला) महाराष्ट्र के सतारा जिले में सतारा शहर से २० कि॰मी॰ दूरी पर स्थित है। यह मराठा शासक छत्रपती शिवाजी महाराज के अधिकार में था। उन्होंने इस किले को नीरा और कोयना नदियों की ओर से सुरक्षा बढ़ाने के उद्देश्य से बनवाया था। १६५६ में किले का निर्माण पूर्ण हुआ था।उसी वर्ष १० नवम्बर को इसी किले से शिवाजी और अफज़ल खान के बीच युद्ध हुआ था और इस युद्ध में शिवाजी को विजय प्राप्त हुई थी। इस जीत से मराठा साम्राज्य की हिम्मत को और बढ़ावा मिला था।
Pratapgarh fort Maharashtra image
Pratapgarh fort

किले पर कैसे पहुंचे? (How to reach pratapgarh fort?)

सातारा शहर से २० km दूर इस किले तक जाने का सिर्फ एक ही रास्ता है।  सातारा एक कुदरत का वरदान मिला हुए जिला है। इसलिए सफर करते वक्त आपको कुदरत के काफी लुभावनी चीजे देखने को मिलेगी। प्रसिद्ध कास पठार भी आपको इस जिले में ही मिल जाएगी।

सड़क मार्ग

सिर्फ सड़क मार्ग से ही आप किले तक पहुंच सकते है। लेकिन आप सातारा तक रेल्वे से पहुंच सकते है। और उसके बाद सातारा से आगे का रास्ता सड़क मार्ग से पूरा करना पड़ता है।

रेल्वे मार्ग

सातारा तक ही रेल्वे मार्ग की सुविधा उपलब्ध है। और फिर सातारा से आगे बस,कैब से किले तक पहुंचना होता है।

हवाई मार्ग

अगर हवाई मार्ग से जाना चाहे तो पुणे तक हवाई सफर तय करने की सुविधा है। फिर पुणे से सातारा तक रेल्वे या बस, कैब की सेवा का उपयोग कर सकते है।

प्रतापगढ़ किले पर पर्यटन 

किलें के दरवाजे

किले के बुरूंज

प्रतापगढ़ पर चार बुरुंज है जिसे हिंदी के तटबंदी किला कहा जाता है। यहां से दुश्मनो पर नजर रखी जा सकती है। और पूरे इलाके पर नजर भी नजर रखी जाती थी। बूरूंज के नाम कुछ इस तरह थे।

बालेकिल्ला

बलेकिल्ला यह वो जगह है जहापर शिवाजी महाराज का परिवार या फिर स्वराज्य के बड़े अधिकारी रहा करते थे। ये जगह किले कि सबसे सुरक्षित जगह है। अगर दुश्मन ने किले के दरवाजे खोल भी लिए फिर भी बालेकिला जितना दुश्मन के लिए बेहद मुश्किल काम होगा। शायद इसी वजह से प्रतापगढ़ पर कोई जीत हासिल नहीं कर सका। बलेकिला प्रतापगढ़ किले के मुख्य आकर्षणों में से एक है। इसे आपको जरूर देखना चाहिए।

अफजल खान की कब्र

किले की नीचे की तरफ शुरुवात में ही आपको अफजल खान की कब्र देकनें को मिलेगी। अफजल खान स्वराज्य के लिए बहुत बड़ा खतरा बनकर सामने आया था लेकिन शिवाजी महाराज ने इस खतरे को यहिपर ख़तम किया। अफजल खान की मौत याहिपर हुई थी और उसका अंतिम संस्कार करने के लिए कोई नहीं था। शिवाजी महाराज मानते थे कि शत्रु जबतक जिंदा है तबतक ही वो हमारा शत्रु है। मरने के बाद जब दुश्मन ही नहीं रहता तो दुश्मनी भी ख़तम हो जाती है। इसलिए पूरी शिद्दत से मुस्लिम तौर तरीको के साथ अफजल खान को याहिपार दफनाया गया। हालाकि यह कब्र अब पर्यटन के लिए बंद हो चुकी है।

शिवाजी महाराज की मूर्ति/प्रतिमा

कड़ेलोट टोक

कदेलोट वह जगह है जहां से मुजरिमों को मौत की सजा दी जाती थी। दरबार में जिसे भी मौत की सजा सुनाई जाती थी उस यहां लाकर यहा से करीब ३०० फिट नीचे फेंक दिया जाता था। यह सब सिर्फ इसलिए किया जाता था क्योंकि जुर्म करनेवालों में कौफ बना रहे जिससे और किसी कि जुर्म करने कि हिम्मत ना हो। पर यहासे किसी को भी मृत्युदंड देने की इतिहास में नोंद नहीं है।

भवानी माता मंदिर 

इस मंदिर के बनाने की कहानी कुछ यूं है कि शिवाजी महाराज एक बार तुलजापुर के भवानी मंदिर में नहीं जा पाए। इसलिए यही पर उन्हे भवानी माता के दर्शन करने के लिए इस मंदिर का निर्माण कराया गया। इस मंदिर में भवानी माता की एक मूर्ति है।और उसी मूर्ति के आगे शिवाजी महाराज के साले सरसेनापती हम्बीरराव मोहिते की तलवार है। और इसिंके साथ साथ एक छोटा सा शिवलिंग भी है जो कि कांच में रखा है। दिखने में तो यह शिवलिंग काच का लगता है लेकिन ये शिवलिंग कांच का ना होते हुए स्फुटिक पावडर का बना हुआ है। इस मंदिर में रखी भवानी माता की प्रतिमा नेपाल के गंडकी नदी के पत्थर से बनाई गई है।

केदारेश्वर मंदिर

यह भगवान शंकर का मंदिर है। इस मंदिर में को शिवलिंग है वो स्वयंभु शिवलिंग है ऐसा कहा जाता है। स्वयंभु शिवलिंग का अर्थ है खुदसे बना हुआ जिसका निर्माता खुद भगवान ही हो।

प्रतापगढ़ की लढाई

प्रतापगढ़ किले को महाराष्ट्र के इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण स्थान है। प्रतापगढ किले का निर्माण होने से पहले इस किले कि पहाड़ी आदिलशाही के पास थी। आदिलशाही के सूबेदार चंद्राराव मोरे के सूबेदारी में इस जगह के पूरे इलाके को  जावली  के नाम से जाना जाता था। शिवाजी महाराज ने चंद्रराव मोरे से बातचीत करके स्वराज्य में शामिल होने के लिए कहा लेकिन चंद्राराव मोरे नहीं माना। इसलिए १६५० में शिवाजी महाराज को जावली पर आक्रमण करना पड़ा। 

१६५६ को शिवाजी महराज ने पूरी जवाली पर कब्जा कर लिया । इस घटना से पूरी आदिलशाही को बहुत बड़ा झटका लगा। शिवाजी महाराज द्वारा जावली पर कब्जा करने के बाद इसकी निगरानी के लिए मजबूत किले कि जरुरत थी। इस जरुरत को शिवाजी महराज के प्रधान मोरोपंत पिंगले और हिरोजी इंदुलकर इन दो वास्तु विशारद ने पूरी की। फिर १६५६ में जावली के प्रांत में एक किला बनाने का काम मोरोपंत पिंगले और हिरोजी इंदुलकर इनकी निगरानी में शुरू हुआ। केवल २ सालो में यह किला बनकर तैयार हुआ। इस किले जा निर्माण कुछ इस तरह किया गया है कि किले के नीचे से किले का दरवाजा नहीं दिखता।

शिवाजी महाराज ने आदिलशाही का बहुत बड़ा प्रदेश हथिया लिया था। इसलिए आदिलशाह शिवाजी महाराज पर बहुत नाराज़ था। वो किसी भी तरह से जावली को फिर से आदिलशाही के अधिकार क्षेत्र में लाना चाहता था। लेकिन १६५६ के आसपास शिवाजी महाराज का दबदबा दक्षिण में बढ़ता जा रहा था। स्वराज्य का विस्तार तेजी से हो रहा था। उस समय तक शिवाजी महाराज बहुत सी लड़ाइयां लड़कर खुदको साबित कर चुके थे। अपने पराक्रम की वजह से मशहूर हो रहे थे। मुगल, आदिलशाही,और निजामशाही के सरदारों में शिवाजी महाराज का खौफ बढ़ता जा रहा था। 

१६५६ तक परिस्थिति ये हो चुकी थी कि जो भी शिवाजी से लडने जाता था वो वापस लौटकर नहीं आता था। इसलिए सारे सरदार शिवाजी महराज से काफी डरते थे। कोई भी शिवाजी महाराज के आड़े नहीं आना चाहता था। शिवाजी महाराज एक के बाद एक किला जीतते जा रहे थे। इस वजह से मुगल,निजाम,आदिलशाह को काफी नुकसान हो रहा था। इसलिए एक दिन आदिलशाह की मां बड़ी बेगम ने शिवाजी महाराज को मारने के लिए सभा बुलाई। सभा में तय होना था कि शिवाजी को मारने के लिए कोन और कितनी ताकत के साथ जाएगा। लेकिन शिवाजी महराज का डर सरदारों में इस कदर था कि कोई भी ये जोखिम भरी मुहिम हात में नहीं लेना चाहता था।

काफी देर हो गई पर कोई भी सरदार शिवाजी महाराज को मारने के लिए नहीं जाना चाहा रहा था। बड़ी बेगम ने पूछा कि  क्या कोई भी ये काम हात में नहीं लेना चाहता है? तभी एक सरदार हात उठता है। नाम था अफजल खान! बेहद क्रूर जहा भी जाता था लूटपाट मचाता था। ७ फूट का अधेड़ शरीर जिसमें हाती जैसा बल और देखते ही किसी को भी डर लगे ऐसा आदमी के रूप में राक्षस। सभा मंडप में एक खुशी कि लहर सी आ गई।  सभी सरदार अफजल खान के बारे के अच्छी तरह से जानते थे। सबको पता था कि अफजल खान एक बार कोई काम हात में लेता है तो फिर उसे कोई भी नहीं रोक सकता। 
खान लगभग ४०००० की फौज लेकर प्रतापगढ़ के पास वाई नाम की जगह तक आ गया अफजल खान वाई का  कुछ साल सूबेदार था। इसलिए वाई की काफी जानकारी उसे थी। अफजल खान काफी होशियार था और फिर अफजल खान की तैयारी को देखे हुए उससे आमने सामने की लड़ाई लड़ना मराठो के लिए काफी मुश्किल था। इसलिए शिवाजी महाराज ने अफजल खान को मिलकल बात करने का न्योता दिया। अफजल खान ने अपने वकील कृष्णाजी भास्कर कुलकर्णी को शिवाजी महराज के पास प्रतापगढ़ पर भेजा।

बातचीत पूरी करने पर मिलने का समय और दिन तय हुआ। १८ नवम्बर मिलने का दिन आया । प्रतापगढ़ के पास की ही एक जगह तय हुई थी। शिवाजी महाराज ने जैसा की तय हुए था वैसे अफजल खान के स्वागत कि पुरी तैयारी किय हुई थी। मिलने के लिए बेहद खूबसूरत शामियाना तैयार किया हुआ था। अफजल खान शामियाना के आ चुका था। अब बस इंतजार था शिवाजी महाराज का। शिवाजी महाराज दोपहर के समय किले से बाहर निकले । साथ में दस अंगरक्षक भी थे। जिनमे से एक जिवा महाला था। और अफजल खान ने अपने साथ एक अंगरक्षक रखा था सैयद बंडा नाम का ।

 शिवाजी महाराज ने पहले ही सैयद बंडा को शामियाने से दूर रखने के लिए अफजल खान से कहा था।  जैसे ही शिवाजी महराज शामियाना के पास पहुंचे अपने अंगरक्षक को बाहर ही खड़ा करके शामियाना के अंदर चले गए। अब शामियाना के अंदर सिर्फ शिवाजी महाराज अफजल खान और अफजल खान का वकील कृष्णजी मौजूद थे।





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