कोंढाना/सिहगड़ इतिहास,लढाई,पर्यटन के बारे में जानकारी

कोंढाना/सिहगड़ के बारे में जानकारी 

नमस्कार दोस्तो आज हम सिंहगड किले के सारे हे जानेंगे पुणे हे ३० किमी और मुंबई से १८० किमी दूर यह किल्ला महाराष्ट्र के इतिहास मे महत्त्वपुर्ण स्थान प्राप्त पिते हुये है।


सिंहगड किले के बारे में विस्तृत में जानकारी
Sinhgad fort 

 भौतिक स्थान(Sinhgad fort map)



जमीन से उंचाई ७६० मीटर

समुद्र किनारे से उंचाई १३१२ मीटर
पुणे से ३० किमी और मुंबई से १८० किमी दूर

 सिंहगड किले के बारे में संक्षिप्त मे जानकारी


सिंहगड किला सह्याद्री पर्वतमाला के भुलेश्वर पहाडी पर स्थित है। हर तरफ से तीव्र उतार और किले की उंचाई का फायदा किले के संरक्षण के लिए होता है। अगर आप गाडी या किसी वाहन से किले पर जाना चाहते है तो वनविभाग आपसे उपद्रव शुल्क लेता है जो कि टू व्हीलर के लिए २० रुपए और फोर व्हीलर के लिए ५० रुपए होता है। किले पर पार्किंग की सुविधा उपलब्ध कराई गई है इसलिए आपको गाड़ी पार्क करने में दिक्कत नहीं आएगी। किले पर छोटी छोटी दुकानें है जहासे आप खाने पीने के लिए स्नैक्स वगैरा खरीद सकतें हो।

इस किले पर आपको बहुत सी चीजें देखने को मिलेगी जो कि आप को अन्य जगह पर नहीं देखने को मिलती पूरा किला देखने के लिए आपको लगभग २-३ घंटे का वक्त का वक्त लगेगा यह किला उंचाई पर होने के कारण आपकों यहासे राजगढ़, लोहगढ़, विसापुर का किला जैसे किले देखने को मिलेंगे। किले के शुरुवाती चढ़ाई पर सबसे पहले आपको पुणे दरवाजा आपको देखने को मिलेगा यहापर पुणे दरवाजा नाम के २ दरवाजे है। पुणे दरवाजे से आगे आते ही आपको बाए बाजू में खंदकड़ा देखेंगे यहापर तटबंदी है। यहासे आपको कल्याण दरवाजा देखने को मिलेगा  और ऐसे आप पूरा  घूम सकते हो किले पर बहुत सी ऐतिकासिक वास्तु आपको देखने मिलेगी जो कि आगे जानेंगे
सिंहगड किले के बारे में विस्तृत जानकारी
Sinhgad fort

सिंहगड किले पर स्थित ऐतिहासिक वास्तुएं

पुणे दरवाजा


किले पर चढ़ाई करते वक्त सबसे पहली कोनसी वास्तु दिखती है तो वो यही है। किले का सबसे पहला दरवाजा पुणे दरवाजा।
पुणे दरवाजा और सिंहगड किले के बारे में विस्तृत में जानकारी
pune gate

कल्याण दरवाजा


पुणे दरवाजे से आगे आते ही कल्याण दरवाजा देखने को मिलता है और इस दरवाजे से आपको राजगढ़ दिखेगा। किले पर स्तिथ कई दरवाजे आज जीर्ण अवस्था में है।

तानाजी कड़ा


इस किले का मुख्य आकर्षण है तानाजी कड़ा इसी जगह है किले पर चढ़कर मराठो ने मुगलों से किले को आजाद कराकर स्वराज्य में शामिल किया था सिर्फ ६० मावलो की सेना के साथ इस किले पर विजय हासिल किया था। यह लड़ाई ताना जी की जिंदगी नकी आखरी लड़ाई साबित हुई इस बात से छत्रपति शिवाजी महाराज को बहुत दुख हुआ इसलिए कोंढाना का नाम बदल कर उन्होंने सिंहगड रख दिया। और तनाजी की वज़ह से आज कोंढाना को सिहगड़ के नाम से जाना जाता है सलाम तानजी जैसे वीरों को।
तानाजी कड़ा और सिंहगड किले के बारे में विस्तृत में जानकारी
View Form Sinhgarh Fort

तोपखाना


खंडकड़ा से आगे जाने पर तोपखाना देखने को मिलेगा याहापर युद्ध के लिए लगने वाली सामग्री रखी जाती थी।  लकीन दुर्भाग्यवश यहापर आपको कुछ खास देखने को नहीं मिलेगा क्योंकि किले कि ज्यादा तर ढांचे आज खंडहर बन गए है।

तिलक बंगला


भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बहुत बड़ा योगदान देने वाले बाल गंगाधर तिलक का बंगला यहा पर है। गर्मी के दिनों में तिलक याहापार आकर आराम किया करते थे। महात्मा गंधीजी भी तिलक साहब से मिलने ३-४ बार इस बंगले पर आयें थे।

राजाराम महाराज समाधि


२ मार्च १७०६ के दिन राजाराम महाराज का दुखद निधन इसी किले पर हुआ था इसलिए उनकी समाधि आपको इस किले पर देखने को मिलेगी अपने छत्रपति बनने के बाद लगातार ११ साल तक उन्होंने मुगलों से लड़ते रहे ३० साल की बहुत ही कम उम्र में उनका दुखद निधन हुआ। और पीछे स्वराज और अपनी पत्नी ताराबाई को छोड़कर चल बसे।
 राजाराम महाराज की समाधि और सिंहगड किले के बारे में विस्तृत में जानकारी
Rajaram  Maharaj samadhi


घोड़े की पागा


शिवाजी महाराज के और उनके साथियों के घोड बांधने के लिए इस जगह का उपयोग किया जाता था जो आज भी काफी अच्छी हालत में है।
घोड़ों की पागा और सिंहगड किले के बारे में विस्तृत में जानकारी घोड़े का तबेला
Horse tambu

देवटाकी


वैसे तो किले पर बहुत सारी पानी कि टंकियां है पर उन सबका पानी आजकल पीने के लायक नहीं है। लेकिन देवताकी ऐसी टाकी है जिसका पानी आजभी लोग पीने के लिए इस्तेमाल करते है। इस टंकी का पानी साफ है और पीने लायक भी है।



सिंहगड का प्रसिद्ध युद्ध


वैसे तो सिंहगड किले को लेकर काफी बार युद्ध किए गए पर सिंहगड की इतिहास में एक युद्ध ऐसा भी था जिससे कोंढ़ाना किला सिंहगड में बदल गया उसी युद्ध के बारे में हम जानेंगे



सिंहगड़ किला १६७० के समय में मुगलों के पास था और स्वराज कि राजधानी  इस किले से काफी नजदीक थी सिंहगड को उस समय कोंढ़ाना के नाम से जाना जाता था। कोंढ़ाना काफी मजबूत और बड़ा किला होने के साथ साथ काफी महफूज़ भी था। और वहासे पूरे पुणे पर नजर रखी जा सकती थी। और ऐसा किला शत्रु के पास रहना स्वराज्य के लिए बाधा पैदा करता था इसलिए शिवाजी महाराज चाहते थे की यह किला कैसे भी करके मराठो के कब्जे में आ जाए लेकिन तीव्र उतार और काफी ऊंचाई की वजह से किले को हासिल करना और वो भी मुगलों से बड़ा चुनौती भरा काम था। इसलिए शिवाजी महाराज ने एक दिन बैठक बुलाई बैठक में यह तय होना था कि कोंढ़ाना पर चढ़ाई करने कोन जाएगा।

उसी दिन शिवाजी महाराज के बचपन के दोस्त और मराठा सूबेदार  तानाजी मालुसरे अपने बेटे रायबा के शादी का निमंत्रण देने महाराज के पास आगे थे। आते ही उन्हें पता चला कि कोंढ़ाना पर चढ़ाई करने की मोहिम बनाई जा रही है। बैठक में शिवाजी महाराज के आवाहन किए जाने पर तानाजी मालुसरे उठ खड़े हुए महाराज को कोंढ़ाना मुहिम पर खुदको भेजे जाने के लिए आग्रह करने लगे अपने बेटे की शादी को छोड़कर तानाजी मालुसरे मुहिम पर जाना चाहते है ये देखकर वहा के सारे सरदार सैनिक अचंबित हो गए छत्रपति शिवाजी महाराज और बाकी लोगों ने समझाने कि कोशिश करी लेकिन तानाजी मालुसरे कहा सुनने वाले थे। आखिर कार तानाजी मालुसरे कोंढ़ाना मुहिम का नेतृत्व करेंगे यह तय हुआ। अब बात थी कि कोंढ़ाना पर चढ़ाई कैसे करे? क्योंकि कोंढ़ाना किला ऊंचाई पर होते हुए और बेहद तीव्र उतार  होने की वजह से सीधे हमला करना नामुमकिन था। पूरी छानबीन करने के बाद तय हुआ कि मराठा सैनिकों को किले के पीछे की तरफ से किले पर चढ़ाया जाएगा और मराठा सैन्य भी कम रहेगा। किले की पीछे वाली बाजू ९० अंश सीधी थी इसलिए चढाई भी बहुत मुश्किल थी। इसलिए मुगल किलेदार जानता था कि यहां से तो हमला नहीं होगा इसलिए पीछे की तरफ ज्यादा सैनिक भी तैनात नहीं किए गए थे।

तैयारी होने के बाद लड़ाई की रात आ चुकी थी। जी हां मराठा ज्यादातर मुहिम रात के समय ही करते थे। रात में ५०० मराठा सैनिकों को किले कि पीछे की तरफ से किले पर डोर की सहायता से चढाया गया। और हरहर महादेव की गुंज के साथ युद्ध शुरू हुआ।  इस युद्ध में मराठो की तरफ से सुभेदार तानाजी मालुसरे, सूर्याजी मालुसरे और उनके साथ ५०० सैनिक थे और उनके सामने मुगल किलेदार और सैनिक थे उस रात मराठा सैन्य और मुगल सैन्य के बीच काफी घनघोर युद्ध हुआ मराठी के लिए परिस्थिति प्रतिकूल होते हुए भी मराठा सेना  कें साहस के साथ मराठाओ ने युद्ध को अपने पक्ष में किया। इसी बीच तानाजी मालूसरे और मुगल किलेदार दोनोंमे युद्ध चल रहा था। तभी तानाजी की ढाल टूट गई पर फिर भी हार ना मानते हुए अपनी पगड़ी निकालकर तानाजी ने उसका ढाल की तरह उपयोग किया। मराठा सेना जीत ही रही थी तभी तानाजी मालुसरे गिर गए और वीरगती को प्राप्त हो गए ये देख कर मराठा सैनिकों में खलबली मच गई। मराठा सैन्य पीछे हटने लगी और सैनिक किले कि पीछे की तरफ भागने लगे। ये देखकर तानाजी मालुसरे के भाई सुर्याजी ने पीछे  की तरफ की डोर ही काट डाली। और मराठा सैन्य को आगाह किया कि या तो यहां से कूदकर मर जाओ या फिर मुघलों से लड़कर किला जीतकर आपनी जान बचाओ। अब मराठा सैनिकों के पास कूदकर मर जाने या फिर मुगलों से लडने के अलावा कोई पर्याय नहीं था। फिर एक बार मराठा सैनिकों ने पूरे जोश के साथ मुगल सैनिकों को हमला बोल दिया। और पूरी रात के घनघोर युद्ध के बाद किले को हासिल कर लिया। और कोंढ़ाना किला मराठा साम्राज्य  में शामिल हो गया।

गढ़ आला पन सिंह गेला..!

किला जीत लेने की बात जब शिवाजी महाराज को पता चली तो शिवाजी महाराज बेहद खुश थे पर जब उन्हें पता चला कि लड़ते वक्त तानाजी मालुसरे वीरगति प्राप्त हुए तो फिर शिवाजी महाराज को बहुत दुख हुआ कोंढ़ाना किला तो जीत लिया पर पर उनका शेर जैसा सैनिक और दोस्त अब उनके बीच नहीं रहा था।  तानाजी मालुसरे बेहद शुर योद्धा थे। ( गढ़ आला पन सिंह गेला ) किला हासिल हुआ पर शेर जैसा सैनिक नहीं रहा ऐसा कहते हुए शिवाजी महाराज ने तानाजी मालुसरे की याद में कोंढ़ाना किले का नाम बदलकर सिंहगड कर दिया।

मराठा साम्राज्य की बेहद यादगार लड़ाई इस सिंहगड किले पर लड़ी गई थीं।

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3 टिप्पणियां

  1. उत्तर
    1. आपको पसंद आया इसमें ही लिखने कि मेहनत सार्थक हो गयी।

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